"मन में चल रहे द्वंदो की शक्ति"

 बहुत समय पहले की बात है। एक पहुंचे हुए सिद्धमहात्मा  थे। उनको जो कुछ भी भेंट में मिलता था, वह सभी सामान कुटिया में रख देते थे। वे उसी चीज का इस्तेमाल करते थे जो, उनके लिए बहुत जरूरी थी। काफी समय बीतने के बाद उन्होंने सोचा कि अपने पुराने मित्रों से मिलना चाहिए।

"मन में चल रहे द्वंदो की शक्ति"


जैसे ही महात्मा कुटिया से बहार निकले उनके बहुत खास मित्र उनसे मिलने आए। लेकिन वह बारिश और कीचड़ में बहुत बुरी तरह अपने कपड़े खराब कर चुके थे। 


महात्मा जी ने कहा देखो, मैं कुटिया में तो नहीं रुक सकता। आप मेरे साथ चल सकते हो। लेकिन उनके कपड़े खराब हो चुके थे। इसलिए उन्होंने आग्रह किया कि आपके पास कोई पुराने कपड़े हो तो मैं भी आपके साथ चल सकू। उन्होंने कुटिया में जाकर देखा कुछ समय पहले एक राजा ने उनको बहुत ही अच्छा राजसी पोशाक दी थी। वह पोशाक उन्होंने अपने मित्र को दी और दोनों साथ में चल दिए…


महात्मा जी ने जब पोशाक पहने अपने मित्र को देखा तो उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गई है। उन्होंने सोचा यह तो बहुत ही अच्छा और सुंदर लग रहा है जबकि मैं एक महात्मा… फिर उन्होंने सोचा कि मैं एक संत हूं। मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए। अपने मन को काबू में रख कर वे अपने मित्र के घर पहुंच गए। परंतु उनके मन में तो पोशाक चल रही थी।

मित्र के घर पहुंचते ही मित्र ने साथ वाले व्यक्ति का परिचय जानने की कोशिश की तो, महात्मा बोले यह हमारे बहुत घनिष्ठ मित्र है। पुराने मित्र है। रही बात कपड़ों की वह मेरे है। इतना सुनते ही मित्र को आश्चर्य हुआ महात्मा जी यह सब क्या…?  ऐसा कहने की क्या जरूरत थी। महात्मा जी को भी थोड़ा आश्चर्य हुआ कि मैंने ऐसे शब्द कैसे बोल दिए परंतु उनके मन में तो पूरे रास्ते पोशाक ही चल रही थी।


महात्मा जी ने कसम खाई की अब अगले मित्र के पास जाएंगे तो कपड़ों की कोई बात ही नहीं करेंगे। बस यही सोचते सोचते वे अगले मित्र के घर पहुंचे। जैसे ही मित्र के घर पहुंचते है। उनका परिचय देते हुए कहते हैं कि, यह हमारे मित्र है। बहुत घनिष्ठ… रही बात कपड़ों की वे उन्हीं के है। फिर मित्र को बुरा लगा उन्होंने सोचा महात्मा जी यह क्या…? आप ऐसे शब्द कैसे कह सकते है। बार-बार कपड़ों की बात का महात्मा जी को भी बुरा लगा। उन्होंने सोचा आज मुझे क्या हो गया है…? मेरे अंदर ईर्ष्या पैदा हो गई है। अब चाहे कुछ भी हो जाए कपड़ों के बारे में कोई बात ही नहीं करनी…


अगले मित्र के पास पहुंचते ही महात्मा जी ने कहा कि, ये हमारे मित्र है। बहुत घनिष्ठ मित्र है। रही बात कपड़ों की उसकी मैं चर्चा ही नहीं करूंगा। फिर से मित्र को बुरा लगा और महात्मा जी ने सोचा की मुझे ऐसा क्या हो गया है…? कि मैं इसके कपड़ों से ईर्ष्या करने लगा हूं।


जब तक हमारे मन में द्वंद चलता रहेगा तब तक हम उस द्वंद से पीछा नहीं छुड़ा सकते। संकल्प की शक्ति... जब तक आप संकल्प के बारे में सोचते रहेंगे आप उसका पालन नहीं कर सकते वो हर बार टूटेगा…


जैसे उदाहरण के तौर पर मान के चलिए की आप ब्रह्मचर्य का व्रत लेते है, और दिन-रात यही सोचते हैं कि मैं ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा ये टूटना नहीं चाहिए, यह टूटना नहीं चाहिए, यह टूटना नहीं चाहिए... जब तक आपके मन में टूटना जारी रहेगा जब तक आपका व्रत टूटता रहेगा…


अगर आप कोई संकल्प लेते हैं तो उखाड़ फेकिये उन सभी द्वंद को जो आपके संकल्पों में बाधाएं है, और लग जाइए पूरी मेहनत और लगन से... आपके मन में एक बार भी यह विचार नहीं आना चाहिए… की संकल्प क्यों लिया आगे क्या होगा, पीछे क्या होगा, सिर्फ अपनी मेहनत पर ध्यान दीजिए, लगन पर ध्यान दीजिए, संयमित जीवन पर ध्यान दीजिए... सफलता जरूर मिलेगी… अगर आपके मन में द्वंद पैदा हो गया तो आप उस में उलझ कर रह जाएंगे।


#kailashbabustory




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